पुस्तक समीक्षा: विमर्श की तलाश में हर कहानी

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अजय कुमार मिश्रा

नई कहानी के बाद हिंदी कहानी की समीक्षा में कई अवधारणाएं जुड़ीं और कई पुरानी हटीं भी। नई कहानी के बाद वाली कहानियों की आलोचना के लिए, कहानी आलोचना में नए मूल्य आये। कुछ स्थापित हुए, कुछ किनारे लग गए। यह इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योकि अजयश्री की कहानियां शायद उन मानकों से इतर होकर भी मर्म को स्पर्श करती हैं। अजय की कहानियों में यथार्थ और आदर्श का द्वंद्व है पर अंतत: स्थापना आदर्श की होती है,बिना शोर-शराबे के। अजयश्री के इस कहानी संग्रह में कुल पन्द्रह कहानियाँ शामिल हैं। इनमें पुरुष प्रधान समाज के चेहरे को शिद्दत से उभारा गया है। कई कहानियां नारी विमर्श करती लगतीं हैं। इनमें पुरुष की उस मानसिकता को उभारा गया है, जो स्त्री को गुलाम बनाने के लिए अपने द्वारा निर्मित व्यवस्था के जरिये षड्यन्त्र रचती है। ये कहानियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि तमाम तरह की आजादियों के बाद भी स्त्री की हैसियत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, गो कि उसकी दशा जरूर बदली है।

अजयश्री की कहानियों में हमारे समय की पीड़ाएं घनीभूत होकर आईं हैं लेकिन उन्होंने कहानियों को भदेस होने से बचाया है। कहानियों में लेखक शहर से गांव तक की यात्रा करता है। इन कहानियों के कुछ चरित्र बेशक जटिल दिखाई देते हैं पर लेखक का कथा निर्वाह उन्हें जटिल नहीं रहने देता। अजय की कहानियां स्त्री और पुरुष के उन संबंधों को साधने की कोशिश है जहां कहानी का भटकाव होने की सबसे ज्यादा गुंजाइश होती है।

‘क्या नाम दूँ’ कहानी लिव इन रिलेशन की कहानी है जिसमें नायिका को बहुत बाद में पता चलता है कि वह जिसके साथ रह रही है,वह शादी शुदा है। कहानी तब उत्कर्ष की ओर बढ़ती है,जब नायक की पत्नी लिव इन रिलेशन वाली औरत से पति की संतान प्राप्त करने को उत्सुक होती है क्योंकि वह स्वयं ऐसा करने में असमर्थ है। बाद में जब वह अपने ससुर से पूछती है कि पुत्र के असमर्थ होने की दशा में क्या वह अपनी बहू को दूसरे पुरुष के पास औलाद के लिए भेज सकते थे? नारी विमर्श के ऐसे प्रश्न पुरुष के अहं पर तमाचे के समान हैं।

‘वाह क्या माल है’ कहानी छोटी है पर पुरुषों की बीमार मानसिकता पर प्रहार करती है। पत्नी अपने पति से कहती है, एक बात याद रखो, तुम्हारी भी एक बेटी है..लोग ऐसे ही बोलेंगे वाह क्या माल है। ‘मेवालाल’ वात्सल्य से सराबोर कहानी है जबकि ‘लिटिल बुद्धा’ झुग्गी झोपड़ी के बच्चों की मुफलिसी से व्यथित व्यक्ति की कहानी है। ‘प्रेम का पहला कोण’ सोशल मीडिया और वास्तविक जिंदगी के बीच बेहद गहरी और अंधी खाई को प्रदर्शित करती है। ‘चादर’ कहानी चादर को प्रतीक मानकर मानवीय संबंधों के धराशाई होने की दास्तां कहती है।

दरअसल कहानी वह विधा है,जिसमें शब्द साधना को जीवन की बारीकियों से लिंक किया जाता है। इस आधार पर मूल्यांकन करें तो ‘प्रेम का पहला कोण’ की कहानियां जीवन-ऊष्मा से भरपूर हैं। लेकिन यह भी सच है कि अजयश्री को समकालीन कहानी से अभी बहुत कुछ सीखना होगा। उसके लिए लेखक को विषय स्तर पर ही नहीं शैली स्तर पर भी विविधता की दरकार है। वैसे ये कहानियां कोरी गल्प नहीं हैं,चिंतन के लिए प्रेरित करने वाली कहानियाँ हैं। अजय की भाषा सहज और बोधगम्य है। वह जहाँ से आते हैं, उस इलाके की खुशबू और मिठास इनकी भाषा में मौजूद है।

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