पुलिस कमिश्नरी सिस्टम! पहले अपने थाने तो ठीक कीजिये, योगी जी

0
15
संजय भटनागर

मुंबई , पुणे, चंडीगढ़ अथवा देश में जहां कहीं भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली है, वहां किस स्तर पर काबिलियत और भ्रष्टाचार है, इसका विश्लेषण किये बगैर उत्तर प्रदेश की बात करते हैं। यहाँ पुलिस प्रशासन दो स्तर पर ‘युद्धरत’ है, एक अपने ‘बड़े भाई’ आईएएस नौकरशाही से थानेदारों की नियुक्ति में अधिकार और शक्ति को लेकर और सरकार से कमिश्नरी प्रणाली लागू करवाने पर। यह बात दीगर है कि दोनों ही मसलों पर आईएएस ब्यूरोक्रेसी का दखल है। खैर!
फिलहाल बात सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस की हो तो तस्वीर दुव्र्यवहार की, मनमानी की और भ्रष्टाचार की साफ नज़र आती है , बावजूद ट्विटर और सोशल मीडिया पर बन रही या बनाई जा रही पुलिस की मानवीय छवि के। मोटे तौर पर , कमिश्नरी प्रणाली में पुलिस के पास मजिस्ट्रेटी शक्तियां आ जाएंगी और दंड प्रावधान में स्वायत्ता का एलिमेंट आ जाएगा। सवाल यह है कि क्या उतर प्रदेश पुलिस इसके लिए तैयार है , जवाब अगर पुलिस के बाहर किसी से माँगा जाये तो जवाब होगा -नहीं और नहीं। कारण स्पष्ट हैं।

एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के कथन को अगर बेस मान लिया जाये तो उनके अनुसार प्रदेश के किसी भी आईपीएस अधिकारी अगर थानेदारों पर अपने नियंत्रण का सफल दावा कर सके तो कहा जा सकता है की यह प्रणाली ठीक है। यह समझना कोई राकेट साइंस नहीं है कि उत्तर प्रदेश में थाने बेलगाम हैं, चाहे राजनीति के कारण अथवा भ्रष्टाचार की वजह से। बात शत प्रतिशत सही भी है। रोजमर्रा की शिकायतों (ट्विटर पर नहीं) का विश्लेषण अगर ठीक से किया जाये तो पता चलता है कि थाना स्तर पर निरंकुशता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है और थानेदार पुलिस के वर्तमान स्वरूप में अपने आप में एक ‘टापू’ की तरह कार्य कर रहा है।

जिला पुलिस अधीक्षक अपने जिलों में पुलिस रेगुलेशन एक्ट और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रदत्त अधिकारों के कारण जिलाधिकारियों से लाख नाराजगी दिखा लें, आईपीएस एसोसिएशन प्रस्ताव पारित कर ले लेकिन थानों पर नियंत्रण रखने में वे कितना प्रभावी हैं , यह सब जानते हैं। अंग्रेजों ने ‘चेक एंड बैलेंस’ की जिस परिकल्पना को प्रशासन में उतारा और पुलिस को होम मिनिस्ट्री के आधीन रखा, इसके पीछे जो भी भावना रही हो लेकिन उत्तर प्रदेश ( यहाँ सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात हो रही है ) में यह सिस्टम अपनी जगह बिलकुल सही है। यहाँ यह स्मरण करना आवश्यक है कि लगभग 58 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज ने अपने निर्णय में पुलिस के बारे में एक टिप्पणी में इसे ‘एक संगठित गिरोह’ कहा था। हो सकता है कुछ लोगों को यह अतिश्योक्ति लगे लेकिन उत्तर प्रदेश में जो है सबके सामने है, कुछ ढका छुपा नहीं है।

घूम फिर कर बात सरकार पर ही आ जाती है इसलिए मुख्यमंत्री योगी जी, कृपया अपने थाने ठीक कर लीजिये, इन्हें बिकने से रोकिये, इन्हें राजनीति से मुक्त रखिये, इन्हें जाति आधार पर मत चलने दीजिये, इन्हें सिस्टम के प्रति जवाबदेह बनाइये। पहले इतना तो कीजिये – अभी कमिश्नरी सिस्टम का समय नहीं आया है। ……और हाँ , अन्य स्थानों से तुलना मत करने दीजियेगा क्योंकि दो गलत एक सही नहीं बनाते हैं।

(लेखक न्यूजट्रैक/अपना भारत के कार्यकारी संपादक हैं)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here